एमएसीएस के बारे में

महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी

पुणे के डॉ. एम आर जयकर, प्रा. शंकर पुरुषोत्तम आघारकर, डॉ. डी आर गाड़गिल और अन्य शिक्षाविद अनुसंधान में प्रगति लाने हेतु विज्ञान के अध्यापन में सुधार के प्रयास कर रहे थे। भाषा विज्ञान, गणित, संस्कृत, पुरातत्व, इतिहास आदि विषयों में पुणे में अच्छा विकास हुआ था। परंतु विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कमी थी।

महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी की स्थापना और उसकी अनुसंधान संस्था

पुणे में विश्वविद्यालय की स्थापना होने से पहले विज्ञान संस्थान की स्थापना करने का विचार इंडियन लॉ सोसाइटी ने उठाया। लॉ कालेज के प्राचार्य जे आर घारपुरे ने इस विषय को आगे बढ़ाया और 17 अक्तूबर 1944 को माननीय डॉ. एम आर जयकर की अध्यक्षता में सभा का आयोजन किया गया। विज्ञान, कृषि, उद्योग तथा शिक्षा के क्षेत्र के विशेषज्ञ इस सभा में उपस्थित रहे। इसी सभा में एक समिति का गठन किया गया। डॉ. एम आर जयकर की अध्यक्षता में इस समिति में प्राचार्य जे आर घारपुरे, श्री एन सी केलकर, डॉ. आर एच भांडारकर और महामहोपाध्याय डी वी पोतदार थे। समिति को बढ़ाया गया और प्रा. शं पु आघारकर, प्रा. एस एल आजरेकर, प्रा. पी आर आवटी, डॉ. पी जे देवरस, प्रा. डी एल दीक्षित, डॉ. के सी घारपुरे, डॉ. के वी जोशी, डॉ. एन वी कानिटकर, डॉ. डी बी लिमये, प्रा. जी आर परांजपे, प्रा. एच पी परांजप्ये, प्रा. जी बी पटवर्धन, डॉ. डी एल सहस्रबुद्धे का समावेश कर के प्रा. एन वी जोशी को मानद सचिव किया गया।

समिति ने वर्ष 1945-46 में विज्ञान संस्थान की स्थापना पर विचार विमर्श किया। इंडियन लॉ सोसाइटी के तत्वावधान विज्ञान संस्थान की स्थापना का निर्णय लिया गया। लॉ कालेज में बिना किसी शुल्क लिए दो बड़े कक्ष उपलब्ध किए गए। ग्रामीण क्षेत्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उस से जुड़ा अनुसंधान करने पर विशेष ज़ोर दिया गया।

संस्थान को चलाने के लिए महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी की स्थापना की गई। महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी के लक्ष्य और उद्देश्य को निश्चित किया गया। 1) विज्ञान को बढ़ावा देना और उस का राष्ट्र के कल्याण के लिए वास्तविक उपयोग करना; 2) वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक या अनेक संस्थानों का अनुरक्षण करना; 3) वैज्ञानिक पुस्तकालय स्थापना; 4) व्याख्यान, प्रकाशनों, प्रदर्शनियों, आदि के माध्यम से शुद्ध और अनुप्रयुक्त विज्ञान का प्रसार करना

महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी का संविधान तैयार कर के 1 अक्तूबर 1946 को चैरिटेबल सोसायटी अधिनियम के तहत पंजीकृत किया गया। निजी दान और सदस्यता से प्राप्त रकम को ले कर एक पूंजी का निर्माण किया गया। स्वतंत्रा पूर्व परिस्थिती में सरकार से वित्तीय सहायता मिलनी मुश्किल थी। कुछ वैज्ञानिकों ने किसी भी मुआवजे के बजाए अवैतनिक कार्य शुरू किया।

प्रा. शं पु आघारकर को 1946 में संस्थापक निदेशक चुना गया। पुणे में अनुसंधान संस्थान का विचार उन के मन में दीर्घ काल से चल रहा था। उन्होंने कोलकाता और अन्य जगहों में अनेक वैज्ञानिक सोसायटियों का निर्माण किया था और वे उन से जुड़े भी थे। इंडियन सायन्स कांग्रेस असोसिएशन के सचिव और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ सायंसेस जो अभी इंडियन सायन्स एकेडेमी के नाम से जानी जाती है उस के भी वे सचिव रह चुके थे। इसी कारण उन्हें महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी अनुसंधान संस्थान का संस्थापक निदेशक चुनना उचित था।

प्रा. शं पु आघारकर ने अनुसंधान के लिए कुछ उत्साही वैज्ञानिकों को साथ में लिया। सूक्ष्मजीव विज्ञान और जीवरसायन विज्ञान के लिए प्रा. एन वी जोशी, कवक विज्ञान एवं पादप विकृति विज्ञान के लिए प्रा. एस एल आजरेकर, प्राणिविज्ञान के लिए प्रा. पी जे देवरस और वनस्पति विज्ञान तथा मृदा विज्ञान के लिए स्वयं प्रा. आघारकर शामिल हुए।

प्रा. शं पु आघारकर, प्रा. जे जे आसाना, डॉ. वी एन लिखिते और कई ने अपनी व्यक्तिगत किताबें, जर्नले और अन्य प्रकाशन विज्ञान संस्थान के पुस्तकालय को भेंट में दी। इन वरिष्ठ वैज्ञानिकोंने युवाओं को अनुसंधान संस्थान में आकर्षित किया। इन में प्रा. एम एन कामत, डॉ. एन नारायण और डॉ. जी बी देवडीकर थे।

पुणे विश्वविद्यालय और अन्य वैज्ञानिक संघटनों से मान्यता

वर्ष 1948 के अंत में पुणे विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। संस्थान को पुणे विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुभाग 35 के तहत पोस्टग्रेजुएट अनुसंधान संस्थान कर के मान्यता मिली। वर्ष 1952 में संस्थान को बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 के तहत पंजीकृत किया गया। देश के कई भागों से पोस्टग्रेजुएट विद्यार्थी बॉटनी, साइटोजेनेटिक्स, प्लांट ब्रीडिंग, एंटोमोलोजी, झुलॉजी, माइकोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, केमिस्ट्री, बायोकेमिस्ट्री और अग्रिकल्चरल केमिस्ट्री विषय में एम एससी और पीएच डी डिग्री के लिए संस्थान में दाखिल होने लगे।

वर्ष 1948 में पुणे विश्वविद्यालय ने महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी की सहायता से बॉटनी विभाग की स्थापना की। महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी के प्राध्यापक पुणे विश्वविद्यालय के बॉटनी, झुलॉजी और जिओलॉजी में एम एससी पाठ्यक्रम पढ़ाने में योगदान देते थे। सूक्ष्मजीवविज्ञान में एम एससी और पीएच डी डिग्री के लिए केवल महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी में ही सुविधा उपलब्ध थी। जून 1971 से संस्थान में सूक्ष्मजीवविज्ञान पढ़ाने का पोस्टग्रेजुएट केंद्र शुरू किया गया। 1968 में महात्मा फुले कृषि विश्वविद्यालय ने कृषि और संबंधी विषयों में पोस्टग्रेजुएट केंद्र की मान्यता दी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने संस्थान को आम और केले पर अनुसंधान के लिए दो स्कीमें सौंपी।

2 सितंबर 1960 को प्रा. आघारकर का देहांत हुआ। संस्थान पर बड़ी कठिन परिस्थिति आई।

लेकिन कार्यकारी समिति के अध्यक्ष डॉ. सर रघुनाथ परांज्प्ये के मार्गदर्शन से संस्था को फिर से आधार मिला। उसी दौरान 17 अगस्त 1960 को डॉ. जी बी देवडीकर को संस्था का निदेशक बनाया गया। प्रा. एन नारायण और प्रा. एम एन कामत ने डॉ. देवडीकर को इस परिस्थिति में मदत की। बढ़ते कारोबार को समाने के लिए सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी के गोखले इंस्टिट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स अँड एकोनोमिक्स में उस संस्था के संस्थापक निदेशक प्रा. डी आर गाड़गिल ने अपनी संस्था में बिना किराए के जगह उपलब्ध की।

स्वतंत्र वास्तु के लिए संस्थान के कार्यकारी समिति ने महाराष्ट्र सरकार से मुलाक़ात की। महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री वाय बी चव्हाण ने और शिक्षा मंत्री श्री शांतिलाल शाह ने विचार विमर्श कर के संस्थान को पाँच एकर जगह मुफ्त में दे दी। भारत सरकार के शिक्षा मंत्री प्रा. हुमायून कबीर ने संस्था की समस्याओं पर अध्ययन करवाया। निस्वार्थ भाव से चल रहे अनुसन्धान कार्य को ले कर वे प्रभावित हुए। उस के फल स्वरूप भवन का निर्माण, उस की देखभाल और विकास के लिए तीसरे पंच वर्षीय योजना के तहत छ लाख रुपयों का ऍड हॉक अनुदान दिया गया। 1966 में संस्थान स्वतंत्र भवन में कार्यरत हुआ।

भारत सरकार ने महाराष्ट्र विज्ञान वर्धिनी अनुसंधान संस्थान (आघारकर अनुसंधान संस्था) को स्वायत्त अनुसंधान की सूची में समाविष्ट किया।